Paisa Kahan Se Aaya । Paise Ka History Aur Importance | Money Explained in Hindi । पैसे का इतिहास और महत्व | Money History in Hindi

On: January 29, 2026 1:02 AM
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पैसे का इतिहास और महत्व

जीवन में पैसे की आवश्यकता
दोस्तों, जीवन में पैसा कितना जरूरी है, ये शायद मुझे बताने की जरूरत नहीं है। यहाँ जो लोग कहते हैं कि पैसों से खुशी नहीं खरीदी जा सकती, उन्हें जेफ बेजोस, एलन मस्क, बिल गेट्स और मुकेश अंबानी को देखने के बाद, सड़क पर जीवन बिताने वाले लोगों पर भी एक नजर डाल लेनी चाहिए। यकीनन आप पैसे का महत्व समझ जाएंगे। आज के इस जमाने में बिना पैसे के जीना लगभग नामुमकिन है। जीने के लिए पैसा उतना ही जरूरी है, जितना कि हवा, पानी और खाना। यही वजह है कि आज भिखारी से लेकर हर कोई पैसे के पीछे भागता है। यह सिर्फ एक कागज का टुकड़ा नहीं है, इस पैसे में इतनी ताकत है कि कभी जंगलों में रहने वाला इंसान आज आसमान की बुलंदियों को छू रहा है।

पैसे की शुरुआत कहाँ से हुई?

पर इस पैसे की शुरुआत कहाँ से हुई? यह कब बना, कहाँ बना, कैसे इसने लोगों को अपना गुलाम बना लिया, और सबसे जरूरी – पैसा क्या है? आज के इस वीडियो में हम इन सभी सवालों के जवाब देने वाले हैं। वीडियो काफी ज्यादा इंटरेस्टिंग होने वाली है, इसलिए आप वीडियो अंत तक हमारे साथ जरूर बने रहे।

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दुनिया में कुल कितना पैसा है?

क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि आखिर इस वक्त पूरी दुनिया में कितना पैसा है? मतलब अगर पूरी दुनिया के पैसों को इकट्ठा कर लिया जाए, तो ये कितना पैसा होगा? चलिए, हम आपको बताते हैं – वो है 36.8 ट्रिलियन डॉलर। लेकिन जरा ध्यान दीजिए, ये सिर्फ वो पैसा है जो नजर आता है। जो नजर नहीं आता, वो है 1300 ट्रिलियन डॉलर, यानी की 1.3 क्वाड्रिलियन डॉलर।

पैसा आया कहाँ से?

अब सवाल यह है कि इतना पैसा आया कहाँ से? पैसे को किसने बनाया और क्यों बनाया? दोस्तों, इन सभी सवालों के जवाब को जानने के लिए आपको जाना होगा आज से 17000 साल पहले, यानी की 15000 BC में। जब दुनिया में पैसे का कोई नामो-निशान नहीं था, उस समय इंसान छोटे-छोटे कबीलों में रहते थे। उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था – खुद को जिंदा रखना, जिसके लिए वो शिकार किया करते थे। लेकिन हर दिन उतना शिकार मिल पाना जिससे इनके पूरे कबीले का पेट भर जाए, ये पॉसिबल नहीं था। पर भूख को तो कोई रोक नहीं सकता था। इसलिए भूख ही थी, जिसने इस कबीले को दूसरे कबीले से जोड़ा और ये एक-दूसरे से चीजों का आदान-प्रदान करने लगे। ये अपने हथियारों के बदले में ताजा मांस लेते थे, और इसी तरह से उस समय बार्टरिंग सिस्टम का जन्म हुआ, यानी एक सामान के बदले दूसरा सामान देना।

बार्टरिंग सिस्टम की शुरुआत

रिसर्चर्स की मानें तो इस बार्टरिंग सिस्टम की शुरुआत करने वाले मेसोपोटामिया ट्राइब्स थे, जो साउथ-वेस्ट एशिया के मेसोपोटामिया रीजन में रहा करते थे। आज के समय में यहाँ पर इराक है। बार्टरिंग सिस्टम ने लोगों के अंदर कई तरह के परिवर्तन लाए, जिसमें सबसे इम्पोर्टेंट था – ट्रेड। लोग एक-दूसरे से व्यापार करने लगे थे। जो लोग एक समय अपने भोजन के लिए एक-दूसरे का खून बहाया करते थे, वो अब व्यापार करने लगे थे।

बार्टरिंग सिस्टम की खामियाँ

इसी के साथ समय बीतता गया और आबादी बढ़ती गई। हजारों साल बाद, जब लोग शिकार के साथ-साथ अनाज उगाने लगे, तो उन्हें बार्टरिंग सिस्टम में कई तरह की खामियाँ देखने को मिलीं। आबादी अधिक होने की वजह से उन्हें ये याद रखना मुश्किल होने लगा कि किस इंसान को उन्होंने क्या दिया था और किससे क्या लेना है। इस समस्या से बचने के लिए उन्होंने मिट्टी के टुकड़ों के ऊपर लिखना शुरू कर दिया, जिससे अकाउंटिंग की शुरुआत हुई।

लेकिन अभी भी बार्टरिंग सिस्टम में कई तरह की खामियाँ थीं, जिसमें सबसे बड़ी कमी यह थी कि बार्टरिंग सिस्टम के लिए दो लोगों की रजामंदी जरूरी होती थी। क्योंकि कई बार ट्रेड करते समय एक इंसान को तो उसकी जरूरत का सामान मिल जाता था, लेकिन अगले व्यक्ति को वो चीज नहीं चाहिए होती थी, जो सामने वाला उसे दे रहा है। इसलिए एक समय के बाद इस तरह से ट्रेड करना काफी मुश्किल हो गया, और इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए पैसे को जन्म दिया गया।

कमोडिटी मनी

लेकिन ये वो पैसा नहीं था, जो आज आप और मैं इस्तेमाल करते हैं। यह थी कमोडिटी मनी। यानी उस समय के इंसानों ने हर उस चीज को पैसे की तरह इस्तेमाल किया, जो मूल्यवान थी, जो हर किसी के इस्तेमाल में आ सकती थी। जैसे – पालतू जानवर (जिसमें गाय, भैंस, बकरी, गधा शामिल थे), इसके अलावा हथियार (जैसे चाकू, कुल्हाड़ी, तीर, तलवार), साथ ही जानवरों की खाल, नमक, मोर के पंख, अल्कोहल। सबसे अंत में इंसानों को भी दासों के रूप में कमोडिटी मनी में शामिल कर लिया गया।

कमोडिटी मनी ने ट्रेड को आसान तो कर दिया, लेकिन इसकी भी कमी थी। इसमें हर व्यक्ति अपनी चीज को सामने वाले की चीज से अधिक मूल्यवान बताने लगा, जिससे एक बार फिर से ट्रेड करना मुश्किल हो गया। इसलिए अब एक ऐसी चीज की जरूरत थी, जो सभी कमोडिटी मनी की चीजों की कीमत तय कर सके, और लोगों की इसी जरूरत ने मेटेलिक मनी की शुरुआत की।

मेटेलिक मनी

आज से 2600 साल पहले, 620 BC में एन्शिएंट ग्रीस में मेटेलिक मनी की शुरुआत हुई। वहाँ सोने और चाँदी को मिक्स करके सिक्के बनाए गए। इन सिक्कों के ऊपर शेर या बैल के चित्र अंकित होते थे। दोस्तों, इस पर ध्यान दीजिएगा – ये है दुनिया का सबसे पहला सिक्का। ऐसा कहा जाता है कि ये प्राचीन ग्रीक सिक्कों से पहले के हैं।

आपकी नॉलेज के लिए बता दें कि दुनिया में सिक्के बनाने की शुरुआत सबसे पहले चीन में 2000 BC में हुई थी। चीन के लोग उस समय पीतल और ताँबे के सिक्के बनाते थे। लेकिन दुख की बात ये थी कि इन सिक्कों को लाइडिया की तरह प्रसिद्धि नहीं मिली। लाइडिया के बाद ही दुनिया में सिक्कों की भरमार आई। हर एक राजा, हर एक शासन ने अपने नाम के सिक्के निकाले, जिससे दुनिया का हर एक शख्स सिक्कों का इस्तेमाल करने लगा। इन सिक्कों ने ट्रेड में क्रांति ला दी।

सिक्कों की कमियाँ और पेपर मनी का आविष्कार

वैसे देखा जाए तो मेटल मनी भी कमोडिटी मनी का ही हिस्सा थी। फिर समय आया 520 AD का, जब ओवरसीज ट्रेडिंग अपने पीक पर थी। उस समय व्यापार इन्हीं सिक्कों के जरिए होता था। लेकिन इन सिक्कों की सबसे बड़ी कमी इनका वजन था। वजन अधिक होने के साथ-साथ यह समुद्री जहाज में बहुत अधिक जगह लेते थे। इन्हें ट्रांसपोर्ट करने में भी बहुत अधिक समय लगता था, जिस वजह से इनके चोरी होने का भी खतरा बढ़ गया था। इन्हें गिनने में भी काफी कठिनाई आती थी। इसीलिए अब सिक्कों की जगह पर एक ऐसी चीज की जरूरत महसूस हुई, जो वजन में हल्की हो और जो आसानी से स्टोर और काउंट की जा सके।

वैसे यह कहावत तो आपने सुनी होगी – Necessity is the mother of invention यानी आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है। और यही पेपर मनी के साथ भी हुआ। लोगों की जरूरत ने पेपर मनी को जन्म दिया।

पेपर मनी की शुरुआत

साल 1289 में मंगोल चीन का शासक, जो कि चंगेज खान का पोता था, कुबलाई खान ने बर्खास्तगी की चल से सबसे पहले पेपर मनी को बनाया। इस पेपर मनी को उस समय IOU यानी की I Owe You कहा गया, जिसका मतलब था कि “मैं तुम्हारा कर्जदार हूँ”। यानी जब तुम इस पेपर मनी को वापस करोगे, तब तुम्हें तुम्हारे देश की कीमती हीरे-जवाहरात वापस मिल जाएँगे।

लेकिन लोगों ने इस कागज को बदलने की जगह इससे ट्रेड करना शुरू कर दिया, और समय के साथ-साथ यह पेपर मनी चीन के बाहर फैल गया। अब लोगों में ज्यादा से ज्यादा IOU यानी की पेपर मनी को इकट्ठा करने की होड़ लग गई। इसी समय बैंक भी अस्तित्व में आए, जो लोगों से उनके सोने-चाँदी, हीरे लेकर उन्हें पेपर मनी देने लगे। क्योंकि पेपर मनी एक ऐसी चीज थी, जिसे वह जितना चाहे उतना छाप सकते थे, और लोग भी इसे लेने लगे, क्योंकि सोने-चाँदी के चोरी होने का डर लगा रहता था।

बैंकों का उदय और इन्फ्लेशन

कुछ समय बाद यह मिनी बैंक लोगों को भी उधार देने लगे, जिससे पूरी दुनिया में पेपर मनी की बारिश होने लगी। पेपर मनी की अधिकता ने इन्फ्लेशन को जन्म दिया, यानी की महंगाई आ गई। जो सामान एक आउंस में मिलता था, वो अब 10 आउंस में मिलने लगा। बैंकों में उतने सोने के सिक्के नहीं थे, जितने कि शहर भर में पेपर मनी मौजूद थी। इस बात की खबर जब लोगों को हुई, तो वे अपने सिक्कों को लेने के लिए बैंकों की तरफ दौड़ पड़े, लेकिन बैंकों ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया। अब लोगों का बैंकों पर से भरोसा उठ गया। लोगों के पास जो बचे-कुछ सिक्के थे, वो उसे अपने पास घर पर छुपा कर रखने लगे। पैसे का सर्कुलेशन भी अब पहले से बहुत कम हो गया, जिससे लोगों को भारी मुसीबत का सामना करना पड़ा।

गोल्ड स्टैंडर्ड

फिर समय आया 1816 का, जब ब्रिटेन ने एक नए एक्ट के तहत यह एलान किया कि अब उनके पास जितना गोल्ड होगा, वह उतने ही पेपर मनी प्रिंट करेंगे, जिससे महंगाई नहीं बढ़ेगी और कर्ज भी एक लिमिट में ही दिया जाएगा। इस तरह से ब्रिटेन ने अपने पेपर मनी को गोल्ड के स्टैंडर्ड के मुताबिक कर दिया, और कुछ ही समय में ब्रिटेन को देखकर बाकी सारी कंट्रीज ने भी अपने पेपर मनी को गोल्ड स्टैंडर्ड के मुताबिक कर दिया। जिसके बाद साल 1900 में यूनाइटेड स्टेट्स ने भी गोल्ड स्टैंडर्ड को अपना लिया। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि इसके आगे जो होने वाला था, वो काफी भयानक है।

डिफ्लेशन और फिएट मनी

दोस्तों, देश में जब पैसा ज्यादा होता है, तो इन्फ्लेशन होता है, यानी महंगाई बढ़ती है। लेकिन जब पैसा कम होता है, तो डिफ्लेशन होता है, जो महंगाई से भी ज्यादा खतरनाक होता है। और साल 1930 में यही हुआ, उस में डिफ्लेशन हो गई। क्योंकि चीजों की कीमत कम होने की वजह से कंपनियाँ इतना पैसा नहीं कमा पा रही थीं कि वो अपने एम्प्लॉयीज को सैलरी दे सके। ऐसी सिचुएशन में लोगों के पास नौकरियाँ नहीं थीं और ना ही पैसा। जिसके बाद इस मुसीबत से बचने के लिए साल 1933 में प्रेसिडेंट ने गोल्ड और डॉलर के कनेक्शन को हमेशा के लिए खत्म कर दिया, जिससे बैंकों के पास उनकी फिर से पुरानी ताकत लौट आई और अब वो एक बार फिर से धड़ल्ले से नोट छापने लगे।

और फिर कुछ इसी समय बाद इन्फ्लेशन की नौबत आ गई, जिसे कंट्रोल करने के लिए एक बार फिर से अमेरिका ने सेंट्रल बैंक की स्थापना की, जिसका काम ये रेगुलेट करना था कि देश में पैसा ना तो ज्यादा हो और ना ही कम हो। लेकिन वो पैसा, यानी डॉलर, जिसे लोग गोल्ड में कन्वर्ट कर सकते थे, अब वो एक कागज का टुकड़ा बन कर रह गया था, जिसे फिएट मनी कहा गया।

फिएट मनी क्या है?

दोस्तों, दुनिया में जितनी भी करेंसी हैं, वो सभी फिएट मनी हैं। फिएट मनी यानी की वो करेंसी जिसका कोई आंतरिक मूल्य नहीं है, लेकिन सरकार द्वारा लीगल टेंडर यानी की कानूनी मुद्रा के रूप में स्वीकार किया गया है। इसलिए यह कागज की करेंसी हमें वो सब कुछ दिलाती है, जिसकी हम चाह रहे हैं।

PAYAL

PAYAL PATEL | न्यूज़ पढ़ना और सही-सही बातें आप तक पहुँचाना मेरा फेवरेट काम है। 5+ साल से इस फील्ड में लगी हूँ, और कोशिश रहती है कि खबरें सीधे दिल तक जाएँ—साफ, आसान और थोड़ा मज़ेदार अंदाज़ में।
"सच की खोज में हमेशा आगे!"

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